Some Articles on Bharat Vikas Parishad

भारत विकास परिषद् के 50 वर्ष
डॉ॰ कन्हैया लाल गुप्ता
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देश में अनेकानेक सामाजिक, सेवाभावी एवं सांस्कृतिक संगठनों का उद्भव एवं विकास हुआ। इन संगठनों में, जिस संगठन ने भारतीय दर्शन एवं मूल्यों को केन्द्र बिन्दु मानकर सेवा एवं संस्कारों के विविध पारिवारिक एवं सामाजिक प्रकल्पों को अपने हाथ में लेकर भारत में मानव शक्ति के सम्पूर्ण एवं सर्वांगीण विकास का संकल्प लिया है, जिसने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रखर बनाने में अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वहन किया है और जिसने भारतीय जन-मानस में भारतीय संस्कारों के ज्ञान एवं अनुपालन का सरित-प्रवाह करके एक जन-आन्दोलन का सृजन किया है, उस संगठन का नाम है- भारत विकास परिषद्।
व्याख्यात्मक धारणा एवं परिचय
संगठन का नामकरण तीन शब्दों के संयोग पर आधारित है- ‘भारत’, ‘विकास’ और ‘परिषद्’। भारत का अर्थ मात्र भारत की भौगोलिक सीमाओं से नहीं है, वरन् इसमें विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति भी शामिल हैं।
‘भारत’ शब्द में भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति, भारतीय कला, भारतीय मूल्य, भारतीय साहित्य और शिक्षा, भारतीय संस्कार इत्यादि विविध भारतीय आयाम शामिल हैं। ‘विकास’ शब्द इन भारतीय आयामों के प्रचार, संरक्षण एवं सम्वर्द्धन से जुड़ा है।
विकास का अर्थ ‘प्रस्फुटीकरण’ (Unfoldment) भी होता है, जिसका सन्दर्भ प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान देवत्व गुणों को बाहर लाकर समाज के विकास में उसके सदुपयोग के लिये प्रेरणा एवं वातावरण का सृजन करना है।
“भारतीयता का विकास, भारतीय मनीषा और मानवता का उन्मेष, भारतीय मूल्यों और परम्पराओं का उत्कर्ष, भारतीय संवेदना का विस्तार तथा व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता की सुरक्षा ही भारत के विकास का वास्तविक अर्थ है।”
यह महत्वपूर्ण है कि संगठन एक ‘क्लब’ नहीं परिषद् है। परिषद् की धारणा गम्भीर विचार-विमर्श, अनुशासन, तार्किक निर्णय, नियमबद्धता और वैचारिक क्रान्ति जैसे पहलुओं से जुड़ी है।
परिषद् की स्थापना की पृष्ठभूमि
अक्टूबर 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो भारत की सेनाओं के पास उचित रूप से मुकाबला करने के लिये न तो हथियार और न हिमालय की भयंकर शीत में शरीर ढकने के लिये पर्याप्त वस्त्र थे।
दिल्ली के अशोका होटल में जनरल के॰ एस॰ करियप्पा और लाला हंसराज गुप्ता के नेतृत्व में लगभग 400 प्रबुद्ध एवं सम्भ्रान्त लोगों के साथ टास्कफोर्स का स्वागत एवं अभिनन्दन किया गया।
12 जनवरी 1963 को स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी समारोह ने भारतीयों में पुनः नवजीवन का संचार किया। इसी अवसर पर ‘सिटिजन कौंसिल’ का नया नामकरण ‘भारत विकास परिषद्’ किया गया।
परिषद् का प्रारम्भिक गठन
परिषद् की संकल्पना 12 जनवरी 1963 को हुई, किन्तु इसका औपचारिक स्वरूप 10 जुलाई 1963 को मिला जब इसके पंजीयन का प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ।
- प्रथम मुख्य संरक्षक — श्री वी॰पी॰ सिन्हा
- प्रथम अध्यक्ष — लाला हंसराज गुप्ता
- प्रथम महामंत्री — डॉ॰ सूरज प्रकाश
- आराध्य — भारत माता
- पथ प्रदर्शक — स्वामी विवेकानन्द
परिषद् प्रगति का प्रथम दशक (1963-1973)
परिषद् का प्रथम दशक परिषद् के दर्शन और आधारशिला को सुदृढ़ करने का काल रहा। इसी अवधि में 1967 में राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता का शुभारम्भ हुआ।
1969 में परिषद् के मुख पत्र ‘नीति’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तथा 1973 में दिल्ली में छत्रपति शिवाजी महाराज की विशाल प्रतिमा स्थापित की गयी।
परिषद् प्रगति का दूसरा दशक (1973-1983)
इस दशक में डॉ॰ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के मार्गदर्शन में परिषद् का व्यापक विस्तार हुआ। परिषद् के प्रतीक चिन्ह का निर्माण किया गया तथा पहला अखिल भारतीय अधिवेशन आयोजित हुआ।
1982 तक परिषद् की शाखाओं की संख्या 30 तक पहुँच गयी और दक्षिण भारत तक परिषद् की गूँज फैल गयी।
परिषद् प्रगति का तीसरा दशक (1983-1993)
इस दशक में परिषद् का तीव्र विस्तार हुआ। शाखाओं की संख्या 39 से बढ़कर 286 तक पहुँच गयी तथा सदस्य संख्या 11,440 तक हो गयी।
1988 में परिषद् की रजत जयन्ती वर्ष का भव्य आयोजन दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में किया गया तथा 1990 में पहला विकलांग सहायता केन्द्र स्थापित किया गया।
परिषद् प्रगति का चैथा दशक (1993-2003)
इस दशक के प्रारम्भ से ही परिषद् प्रगति का कारवाँ देश के लगभग सभी भागों में तेजी से बढ़ने लगा। इस अवधि में राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में न्यायमूृर्ति हंसराज खन्ना, न्यायमूर्ति एम॰ रामा जॉयस तथा न्यायमूर्ति जितेन्द्रवीर गुप्ता का नेतृत्व मिला।
राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में श्री पी॰एल॰ राही एवं बाद में श्री आर॰पी॰ शर्मा ने परिषद् के संगठनात्मक विस्तार एवं कार्यकलापों को प्रभावी स्वरूप प्रदान किया।
प्रमुख उपलब्धियाँ
- 1994 में ‘चेतना के स्वर’ पुस्तिका का प्रकाशन
- विकलांग पुनर्वास केन्द्रों का विस्तार
- गुरु तेगबहादुर फाउण्डेशन की स्थापना
- ‘भारत को जानो’ प्रतियोगिता का शुभारम्भ
- गुरुवंदन छात्र अभिनन्दन राष्ट्रीय प्रकल्प बना
- ‘समर्पण’ को पाँचवें मूल मंत्र के रूप में जोड़ा गया
- कनाडा के जिन्दल फाउण्डेशन के सहयोग से समग्र ग्राम विकास योजना प्रारम्भ
केन्द्रीय भवन की स्थापना
8 अक्टूबर 1997 को दिल्ली के पीतमपुरा में परिषद् के केन्द्रीय भवन का शिलान्यास हुआ तथा वर्ष 2000 में इसका उद्घाटन किया गया। यह भवन आज परिषद् के राष्ट्रीय संचालन एवं समन्वय का प्रमुख केन्द्र है।
परिषद् प्रगति का पाँचवाँ दशक (2003-2013)
परिषद् के स्वर्ण जयन्ती वर्ष तक पहुँचने वाला यह दशक सदस्य संख्या एवं शाखाओं के तीव्र विस्तार का साक्षी रहा।
768
शाखाएँ (2003-04)
1,147
शाखाएँ (2011-12)
राष्ट्रीय अध्यक्षों में न्यायमूर्ति एस॰ पर्वता राव, न्यायमूर्ति डी॰आर॰ धानुका, श्री आर॰पी॰ शर्मा तथा न्यायमूर्ति वी॰एस॰ कोकजे का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
प्रमुख योजनाएँ एवं उपलब्धियाँ
| वर्ष | उपलब्धि |
|---|---|
| 2004 | ‘ज्ञान प्रभा’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ |
| 2006 | संस्कृत समूहगान एवं लोकगीत प्रतियोगिता प्रारम्भ |
| 2007 | ‘स्वस्थ, समर्थ और संस्कारित भारत’ मिशन स्वीकार |
| 2007-08 | डॉ॰ सूरज प्रकाश स्मृति उत्कृष्टता सम्मान योजना |
| 2011 | महिला सहभागिता एवं प्रशिक्षण कार्यशालाएँ |
स्वर्ण जयन्ती वर्ष
10 जुलाई 2013 को परिषद् ने अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण किये। इस अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम, सेवा प्रकल्प एवं सांस्कृतिक आयोजन सम्पन्न हुए।
स्वामी विवेकानन्द की उत्तरशती जयन्ती के उपलक्ष्य में परिषद् के केन्द्रीय भवन में उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की गयी।
निष्कर्ष
भारत विकास परिषद् ने पिछले पचास वर्षों में सेवा, संस्कार, सहयोग, सम्पर्क एवं समर्पण के आधार पर सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। परिषद् का लक्ष्य ‘स्वस्थ, समर्थ, समृद्ध एवं संस्कारित भारत’ का निर्माण है और यह संगठन भविष्य में भी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।
भारत विकास परिषद्

डा॰ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी
(Niti: Jul., 2013)हम सबके लिए भारत विकास परिषद् एक स्वप्न भी है और स्वप्न का आकार भी। यह एक संस्था भी है और आन्दोलन भी। यह संस्था भारतीय दृष्टि से उपजा हुआ, सम्पर्क से अभिसिंचित, सहयोग के हाथों से निर्मित, संस्कार के हृदय से स्पन्दित, सेवा की अंजुरी में समर्पण का नैवेद्य है।
स्मृतियों के वातायन से देखता हूँ तो आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व की एक संध्या समय की परत मेरी आँखों के सामने उभरती है।
“भारत के विकास की तीर्थयात्रा में समूचे भारत के सपनों और संकल्पों को जोड़ना होगा। भारत विकास परिषद् को भारतव्यापी बनाना होगा।”
लाला हंसराज जी ने मुझे एक प्रीतिभोज में मुख्य अतिथि मनोनीत किया और कहा कि मुझे इस संस्था को दिशा बोध देना है। तब मैं एक निर्दलीय सांसद था।
मैंने अपने भाषण में भारतीय संस्कृति और विकास के अनेक आयामों की चर्चा करते हुए कहा कि केवल प्रीतिभोज के बाद सभा विसर्जित कर देने से भारत का विकास सार्थक नहीं होगा। इसके लिए समर्पित आन्दोलन और राष्ट्रीय चेतना की आवश्यकता होगी।
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से,
प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला,
स्वतंत्रता पुकारती।
लाला हंसराज जी ने मुझे आलिंगन कर कहा — “अब आपने हमें नई दिशा दी है, तो नया विधान भी बनाइए और इस राष्ट्रीय प्रवर्तन की बागडोर संभालिए।”
भाई डा॰ सूरज प्रकाश जी ने उसी दिन संकल्प लिया कि इस स्वप्न को साकार करेंगे।
विदेशों में भारत के राजदूत के रूप में कार्य करते समय भी भारत विकास परिषद् की स्मृतियाँ मेरे हृदय में सदैव जीवित रहीं।
स्वदेश लौटने पर परिषद् के विराट एवं भारतव्यापी स्वरूप को देखकर मैं अत्यन्त उल्लासित हुआ।
भारत विकास परिषद् का मूल भाव
भारत विकास परिषद् वह सेतु है जो भारत के स्वर्णिम अतीत को हीरक भविष्य से जोड़ने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है।
भारत विकास परिषद् का व्यापक क्षितिज

महादेवी
प्रयाग, 3 अप्रैल, 1985“भारत विकास परिषद् का क्षितिज इतना व्यापक है कि उसके विकास को एक आयाम में बाँधना कठिन होगा।
भारत एक भौगोलिक इकाई है, अतः उसके हिमाच्छादित शिखर, नदियाँ, निर्झर, वन-सम्पत्ति आदि के सौन्दर्य को सुरक्षित रखना भी विकास का कार्य है।
उसमें बसने वाले मानव समूह के बुद्धि और हृदय का ऐसा परिष्कार करना कि वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को आत्मसात कर सके, यह भी भारत विकास का महत्वपूर्ण आयाम है।
भारत का विकास
- प्रकृति संरक्षण
- साहित्य एवं कला संवर्धन
- शिक्षा का विस्तार
- ग्राम एवं नगर विकास
जीवन मूल्य
- सत्य
- अहिंसा
- समता
- बन्धुता
इन सबके लिए जो अनिवार्य गुण है, वह दृढ़ संकल्प है। उसके अभाव में कोई कार्य सम्भव नहीं।
शुभकामना
“शुभास्ते पन्थानः सन्तु!”
Bharat Vikas Parishad and Other Social Cultural Organisations

Dr. Suraj Prakash
Niti – June 1989Bharat Vikas Parishad is a non-political, socio-cultural service organisation of the elite among citizens. Other elite social organisations like Rotary and Lions also exist, but Bharat Vikas Parishad differs fundamentally from them.
Bharat Vikas Parishad is not merely a “Club”. It is a “Council” of intellectuals, well-wishers and socially conscious citizens dedicated to the upliftment of the poor, disabled, illiterate and needy.
Difference from Rotary and Lions
Organisations like Rotary and Lions originated outside India and draw inspiration from foreign cultural traditions. Their policies, structures and often even financial control remain linked with organisations outside India.
In contrast, Bharat Vikas Parishad is a completely indigenous organisation, deeply rooted in Indian culture, values and national consciousness.
- Foreign origin
- Influenced by western culture
- International financial control
- Focus on fellowship & publicity
- Social gathering centric
- Completely Indian organisation
- Inspired by Indian culture
- Nationalistic outlook
- Service before publicity
- Mission-oriented social work
Role of Women
Bharat Vikas Parishad gives equal importance to women in all its activities. The organisation believes that comprehensive social development is impossible without active participation of women.
Philosophy and Mission
Fellowship and contact are important in the Parishad, but only as means to achieve higher objectives of service and national reconstruction.
“More service than publicity” is the watchword of Bharat Vikas Parishad.
The Parishad defines service not merely as charity, but as working for:
- Protection of Indian culture and heritage
- Revival of moral and cultural values
- National reconstruction
- Character building and social awakening
- Development of national unity and integrity
A Missionary Spirit
The Parishad believes that true service requires discipline, sacrifice, self-control and a missionary spirit. Every activity should contribute towards changing social thinking and reviving Indian values and “Sanskars”.
Core Message
Bharat Vikas Parishad should never degenerate into an ordinary club. Its identity, purity and mission of genuine national service must always be preserved.
The founders of Bharat Vikas Parishad never intended it to become a carbon copy of social clubs. It was established to create meaningful opportunities for selfless service and national reconstruction.
It is this spirit of sincere service and cultural commitment that has attracted many respected members from Rotary and Lions into the Parishad movement.
भारत विकास परिषद् क्या है?

डॉ. प्रकाशवती शर्मा
(ज्ञान प्रभा, जनवरी-अप्रैल 2008 अंक से)भारत विकास परिषद् क्या है? यह प्रश्न अक्सर लोगों के मन में उठता है। केवल यह कहना कि यह एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) है, परिषद् के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट नहीं करता।
परिषद् केवल एक संस्था नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और जीवन दृष्टि का जीवंत आंदोलन है।
“भारत” केवल भूगोल नहीं है। यह ज्ञान, प्रकाश, चेतना और मूल्यों की सतत साधना का नाम है।
‘भारत’ का अर्थ
‘भा’ अर्थात् प्रकाश और ‘रत’ अर्थात उसमें निरंतर स्थित रहना। इस प्रकार ‘भारत’ वह है जो ज्ञान और चेतना की साधना में निरंतर रत रहे।
भारतीय चिंतन परम्परा में ज्ञान को केवल सूचनाओं, डिग्रियों या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं माना गया है।
भारतीय दर्शन में ज्ञान के दो रूप माने गये हैं:
- प्रमा — यथार्थ एवं निश्चित ज्ञान
- अप्रमा — मिथ्या या अपूर्ण ज्ञान
आत्मज्ञान को ही भारतीय मनीषा में सर्वोच्च ज्ञान माना गया है। वही मनुष्य को बंधनों, दुःखों और अज्ञान से मुक्त करता है।
“सा विद्या या विमुक्तये”
विकास का भारतीय मॉडल
भारत विकास परिषद् पश्चिमी विकास मॉडल की अंधानुकरण में विश्वास नहीं रखती। हमारे लिए विकास का अर्थ केवल भौतिक समृद्धि नहीं है।
भारतीय दृष्टि में शरीर साधन है, साध्य नहीं। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान, संयम और लोकमंगल है।
“पूजा ते विषयोपभोग रचना, निद्रा समाधि स्थिति:।
संचार: पदयो प्रदक्षिण विधि, स्तोत्राणि सर्वा गिरो।।”
— आदि शंकराचार्य
यह कर्मयोग की चरम परिणति है, जहाँ जीवन का प्रत्येक कर्म ईश्वरार्पण बन जाता है।
मनुष्य और विकास
मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो प्रकृति का अतिक्रमण कर सकता है। वह पशुता से ऊपर उठकर देवत्व और ईश्वरत्व तक पहुँच सकता है।
स्वार्थ से परार्थ और फिर परमार्थ तक की यात्रा ही वास्तविक विकास है।
परिषद् का उद्देश्य
भारत विकास परिषद् भारतीय चेतना को पुनर्जीवित करने, भारतीय मूल्यों को गति देने तथा विश्व के समक्ष भारतीय जीवनदृष्टि को प्रतिष्ठित करने का प्रयास है।
परिषद् के मूल उद्देश्य
- भारतीय संस्कृति का संरक्षण
- मानव मूल्यों का विकास
- सेवा एवं संस्कार
- राष्ट्रीय चेतना जागरण
परिषद् की दिशा
- स्वार्थ से परमार्थ तक
- व्यक्ति से समाज तक
- संस्कार से सेवा तक
- भारत से विश्व मानवता तक
निष्कर्ष
राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द और दयानन्द की यह पुण्य परम्परा अनवरत चलती रहे — यही परिषद् की आस्था और विश्वास है।
भारत विकास परिषद्
अस्मिता, संस्कृति, सेवा, समर्पण और आत्मोत्कर्ष की तीर्थयात्रा का नाम है भारत विकास परिषद्।
“अपना प्रश्न पत्र भिन्न है, अतः उत्तर भी भिन्न होगा। जीवन और जगत को देखने का हमारा नजरिया भिन्न है, इसीलिए समाधान भी हमारी माटी की गन्ध से ही मिलेंगे।”
Bharat Vikas Parishad - A Complete NGO

Shri Suresh Chandra
(Editorial in Gyan Prabha, April–June, 2009)Non-Government Organizations (NGOs) are generally classified into three generations based on their style of functioning and objectives. Many organisations begin with first-generation activities and gradually evolve into second and third-generation NGOs.
Three Generations of NGOs
First generation NGOs primarily provide direct relief during emergencies such as floods, earthquakes, wars or famines.
- Food distribution
- Medical assistance
- Shelter support
- Emergency relief operations
In this model, the NGO acts as the “doer” while beneficiaries remain passive recipients.
Second generation NGOs focus on development activities and community empowerment.
- Educational development
- Healthcare facilities
- Village development
- Employment-oriented training
- Self-help groups and local participation
These NGOs work in partnership with local communities to create self-reliant systems.
Third generation NGOs combine relief work, development work and social transformation.
- Emergency assistance during disasters
- Long-term development institutions
- Health and education projects
- Decentralized service delivery
- Social awareness and mental revolution
Their mission extends beyond service delivery towards changing social thinking and values.
Bharat Vikas Parishad as a Complete NGO
Bharat Vikas Parishad is not only a third generation NGO, but much more than that.
Bharat Vikas Parishad originated from a first-generation NGO, the Citizens Forum, formed during the 1962 war efforts.
After the war, it evolved into a second-generation NGO and gradually expanded into a nationwide organisation with multifaceted activities.
Relief Activities
- Flood relief
- Earthquake assistance
- Tsunami support
- Super cyclone rehabilitation
Development Activities
- Hospitals
- Viklang Kendras
- Diagnostic Centers
- Educational & cultural projects
National Spirit and Sanskars
Bharat Vikas Parishad works not only for physical development but also for mental and cultural transformation.
The Parishad is bringing a silent revolution by imbuing national spirit and Sanskaras among youth, families and senior citizens.
Its branches have spread across almost every corner of India. While planning, fundraising and implementation are handled locally by branches, they function under the guidance and supervision of the central organisation.
Conclusion
Bharat Vikas Parishad represents a unique combination of relief work, development initiatives, cultural awakening, national service and social transformation, making it a truly “Complete NGO”.